(1)
हम शहीदों की, शहादत का चलन भूल गये।
खुदपरस्ती के लिए, हुब्बे-वतन भूल गयें।।
ज़िद में हाय! बदन, बाँट लिया जननी का,
बिस्मिल-अश्फाक के, ख़ाबों का चमन भूल गयें।
बारहा मिलते रहें, ईद और होली पर,
इक इमारत के लिए, गंगों- जमन भूल गये।
(2)
न तुम्हारे दर से गुज़रे हम, न हम तेरी डगर जायें।
तुम्हारे ग़म के मारे हम बता दो फिर किधर जायें।।
हमारा आना ही आखिर, तुम्हें क्यों कर अखरता है
नहीं है रोक उन पर क्यों, जों घर शामो सहर जायें
यहाँ तुम मिल नहीं सकते, वहाँ फिर क्या मिलोगे तुम
दिखा दो राह कोई ऐसी, कि दो आलम गुज़र जायें।
(3)
कुछ मत पूछो हाल किसी का।
उलझा हुआ, सवाल किसी का।।
बहक न जाना, पल भर छू के,
महका हुआ, रूमाल किसी का।
शोहरत का, हकदार बना है,
किस्मत देख, कमाल किसी का।
(4)
कोई उसको जान न पाया।
कोशिश की पहचान न पाया।।
कभी नहीं बर्तन टकराये,
ऐसा कोई मकान न पाया।
सबको बराबर करने निकला
खुद जो उँगली समान न पाया।